फूलों की खेती को बढ़ावा, उत्पादकों को मिलेंगे बेहतर दाम..
उत्तराखंड: प्रदेश में फूलों की खेती को संगठित और लाभकारी बनाने के उद्देश्य से सरकार जल्द ही नई पुष्प नीति लाने की तैयारी में है। अब तक राज्य की अपनी कोई स्वतंत्र पुष्प नीति नहीं होने के कारण उत्पादकों को विपणन और मूल्य निर्धारण में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है। प्रस्तावित नीति से इन समस्याओं के समाधान की उम्मीद जताई जा रही है। बागवानी विभाग के अधिकारियों के अनुसार नीति निर्माण से पहले महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य राज्यों की पुष्प नीतियों का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि प्रदेश की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी ढांचा तैयार किया जा सके . राज्य में लंबे समय से जरबेरा, लिलियम, गेंदा, कारनेशन और गुलाब जैसे फूलों की खेती की जा रही है।
हालांकि व्यवस्थित विपणन व्यवस्था न होने के कारण उत्पादकों को अपने फूल स्थानीय बाजारों तक सीमित रखने पड़ते हैं या फिर दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे बाहरी शहरों में भेजना पड़ता है। परिवहन लागत और बिचौलियों की भूमिका के कारण किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। प्रस्तावित पुष्प नीति में पुष्प मंडी की व्यवस्था को शामिल किए जाने की बात कही जा रही है, जिससे उत्पादकों को सीधे बाजार उपलब्ध हो सके। पूर्व में रुद्रपुर में पुष्प मंडी की स्थापना को मंजूरी मिली थी, लेकिन वह अभी तक पूर्ण रूप से संचालित नहीं हो पाई है। उद्यान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि नई नीति के लागू होने के बाद फूलों की खेती को क्लस्टर मॉडल पर विकसित किया जाएगा। इससे उत्पादन, भंडारण, परिवहन और विपणन की समेकित व्यवस्था संभव हो सकेगी। सरकार का मानना है कि संगठित नीति और बाजार ढांचे के माध्यम से न केवल फूल उत्पादकों की आय बढ़ेगी, बल्कि प्रदेश में बागवानी क्षेत्र को भी नई गति मिलेगी।
वसंतोत्सव के बाद लोगों में फूलों की खेती के प्रति बढ़ी रुचि..
निदेशक बागवानी मिशन महेंद्र पाल का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान बड़ी संख्या में पुष्प उत्पादकों ने बाजार में गिरावट और मांग कम होने के कारण फूलों की खेती छोड़ दी थी। विवाह समारोहों, आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के बंद होने से फूलों की खपत पर गहरा असर पड़ा था। हालांकि अब परिस्थितियां सामान्य होने के साथ ही फूलों की मांग में सुधार हुआ है और किसान दोबारा इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं। विशेष रूप से पॉलीहाउस आधारित जरबेरा, लिलियम और अन्य सजावटी फूलों की खेती में युवाओं की दिलचस्पी बढ़ रही है। बता दे कि वर्ष 2003-04 से राजभवन में प्रतिवर्ष वसंतोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन ने स्थानीय उत्पादकों को मंच देने और फूलों की विविधता प्रदर्शित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वसंतोत्सव के माध्यम से न केवल जागरूकता बढ़ी है, बल्कि लोगों में व्यावसायिक स्तर पर फूलों की खेती अपनाने का उत्साह भी बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संगठित नीति, विपणन व्यवस्था और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाए तो प्रदेश में पुष्प उत्पादन एक मजबूत आर्थिक गतिविधि के रूप में उभर सकता है।
656 हेक्टेयर में हो रही फूलों की खेती..
उत्तराखंड में फूलों की खेती धीरे-धीरे विस्तार पकड़ रही है। उद्यान विभाग के अनुसार वर्तमान में प्रदेश में लगभग 656 हेक्टेयर क्षेत्रफल में विभिन्न प्रकार के फूलों की खेती की जा रही है। इसके साथ ही लूज फ्लावर (खुले फूल) श्रेणी में करीब 19.53 मीट्रिक टन उत्पादन दर्ज किया गया है। राज्य में पारंपरिक और संरक्षित खेती (पॉलीहाउस) दोनों माध्यमों से जरबेरा, गुलाब, गेंदा, लिलियम और अन्य सजावटी फूलों का उत्पादन किया जा रहा है। बाजार की मांग को देखते हुए किसान अब व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी पुष्प उत्पादन को अपनाने लगे हैं। फूलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें मुख्यमंत्री एकीकृत बागवानी मिशन प्रमुख है, जिसके तहत किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, अनुदान और संरक्षित खेती के लिए सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा भी विभागीय स्तर पर विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएं लागू की गई हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान बागवानी और पुष्प उत्पादन से जुड़ सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपणन व्यवस्था और प्रसंस्करण सुविधाओं को और मजबूत किया जाए, तो प्रदेश में फूलों की खेती किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
