मातृ-शिशु मृत्यु दर घटाने की कवायद तेज, हाई रिस्क क्षेत्रों की होगी जीआईएस मैपिंग..
उत्तराखंड: देहरादून जिले में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को और कम करने के लिए अब उन इलाकों पर विशेष फोकस किया जाएगा, जहां लगातार जच्चा-बच्चा मृत्यु के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों की पहचान पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के आधार पर की जाएगी। इसके लिए जीआईएस मैपिंग का सहारा लेते हुए हाई रिस्क क्षेत्रों का चिन्हीकरण किया जाएगा और वहां स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए अलग से कार्ययोजना तैयार होगी। यह निर्देश जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मातृ मृत्यु, शिशु मृत्यु और राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की समीक्षा के दौरान दिए। उन्होंने अधिकारियों से सिर्फ आंकड़ों और रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय योजनाओं का प्रभाव जमीनी स्तर पर दिखाई देने की अपेक्षा की।
मातृ-शिशु मृत्यु की रोकथाम के लिए बनेगी टास्क फोर्स
जिलाधिकारी ने मातृ एवं शिशु मृत्यु के मामलों की रोकथाम के लिए टास्क फोर्स गठित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच के साथ हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की लगातार निगरानी की जानी चाहिए। दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं पर विशेष नजर रखने को कहा गया है। आवश्यकता होने पर प्रसव से पहले ही महिला को अस्पताल में भर्ती कराने और सभी जरूरी जांच समय पर कराने के निर्देश दिए गए। गर्भावस्था के दौरान जोखिम की स्थिति सामने आने पर बिना देरी किए उच्च स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र में रेफर करने पर भी जोर दिया गया। घर पर होने वाले प्रसव के मामलों में आशा कार्यकत्रियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश भी दिए गए हैं। बैठक में वर्ष 2026 के दौरान अब तक प्रसव के दौरान या प्रसव के कुछ समय बाद हुई 12 महिलाओं की मृत्यु के मामलों की विस्तार से समीक्षा की गई। जिलाधिकारी ने सभी मामलों की केस स्टडी की जानकारी ली और चार मामलों में संबंधित अधिकारियों से अलग से स्पष्ट आख्या मांगी। प्रेमनगर क्षेत्र की रुखसाना की मृत्यु के मामले में आशा और एएनएम की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण में विरोधाभास सामने आया। समीक्षा में आंकड़ों में छेड़छाड़ और साक्ष्य के तौर पर गलत तारीख के फोटो प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आने पर जिलाधिकारी ने संबंधित एएनएम के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई के निर्देश दिए। जिलाधिकारी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही या रिकॉर्ड से छेड़छाड़ को गंभीरता से लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।
हाई रिस्क इलाकों के लिए अलग बनेगी कार्ययोजना
प्रशासन अब पिछले पांच वर्षों में सामने आए मातृ एवं शिशु मृत्यु के आंकड़ों का विश्लेषण करेगा। इसके आधार पर जीआईएस मैपिंग के जरिए ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित किया जाएगा, जहां मृत्यु के मामले लगातार अधिक रहे हैं। इन इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, जांच सुविधाओं, रेफरल व्यवस्था और गर्भवती महिलाओं की निगरानी समेत अन्य पहलुओं का आकलन किया जाएगा। इसके बाद स्थानीय जरूरत के हिसाब से विशेष कार्ययोजना तैयार की जाएगी। राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की समीक्षा में जिले में जनसंख्या के अनुपात में अपेक्षित संख्या में टीबी जांच और एक्स-रे नहीं होने पर जिलाधिकारी ने नाराजगी जताई। उन्होंने जांच का दायरा बढ़ाने और निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को भी अभियान से जोड़ने के निर्देश दिए। जिलाधिकारी ने अधिक से अधिक संदिग्ध मरीजों की समय पर जांच कराने और टीबी उन्मूलन अभियान को व्यापक स्तर पर संचालित करने पर जोर दिया। बैठक के दौरान टीबी से ठीक हो चुके लोगों और बीमारी की रोकथाम को लेकर जागरूकता फैलाने में योगदान देने वाले पांच टीबी चैंपियनों को सम्मानित भी किया गया।
कई स्वास्थ्य संकेतकों में देहरादून राज्य और देश से बेहतर
समीक्षा बैठक में स्वास्थ्य विभाग की ओर से जिले के मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए। एचआईएमएस 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार देहरादून का मातृ मृत्यु अनुपात 31.0 है। इसकी तुलना में उत्तराखंड का आंकड़ा 99 और राष्ट्रीय स्तर पर 97 बताया गया। जिले का नवजात शिशु मृत्यु दर 10.4 है, जबकि उत्तराखंड में यह 13 और राष्ट्रीय स्तर पर 20 है। इसी तरह देहरादून की शिशु मृत्यु दर 13.8 है, जबकि राज्य में 19 और देश में 28 दर्ज की गई है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर भी जिले में 16.0 है। उत्तराखंड में यह आंकड़ा 21 और राष्ट्रीय स्तर पर 32 है। इन संकेतकों के आधार पर देहरादून की स्थिति कई मामलों में वर्ष 2030 के निर्धारित राष्ट्रीय लक्ष्यों से भी नीचे है।
जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार की जरूरत
बैठक में यह भी सामने आया कि जन्म के समय लिंगानुपात जिले के लिए अभी चिंता का विषय है। देहरादून में यह आंकड़ा 924.4 दर्ज किया गया है, जबकि उत्तराखंड का आंकड़ा 984 और राष्ट्रीय औसत 929 है। वर्ष 2025 के लिए निर्धारित 950 के राष्ट्रीय लक्ष्य की तुलना में भी जिले का आंकड़ा कम है। इस दिशा में सुधार के लिए स्वास्थ्य विभाग को आवश्यक कदम उठाने होंगे। बैठक में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एमके शर्मा, गायनी विशेषज्ञ डॉ. ज्योति शर्मा, प्रोग्राम ऑफिसर प्रखर, विभिन्न अस्पतालों के वरिष्ठ चिकित्सक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सा अधिकारी, एएनएम और आशा कार्यकत्रियां मौजूद रहीं।
