उत्तराखंड की लोकधुनों को मिली नई जिंदगी, 18 कलाकारों के 46 दुर्लभ गीत डिजिटल किए गए..
उत्तराखंड: उत्तराखंड की लोक संस्कृति से जुड़े ऐसे गीत, जिनकी आवाज समय के साथ लोगों की स्मृतियों से भी दूर होती जा रही थी, अब डिजिटल रूप में सुरक्षित कर लिए गए हैं। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार क्षेत्र के पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स को खोजने और संरक्षित करने की पहल के तहत 18 कलाकारों के 46 गीतों का डिजिटलीकरण किया है। इन रिकॉर्ड्स के जरिए उत्तराखंड में करीब चार दशकों तक लोकप्रिय रहे ग्रामोफोन संगीत की झलक अब आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकेगी। इस संग्रह में कई ऐसे गीत भी हैं, जिनके मूल रिकॉर्ड मिलना बेहद मुश्किल हो गया था।
1939 से 1979 तक के संगीत का दस्तावेज
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के इस प्रयास के तहत वर्ष 1939 से 1979 के बीच रिकॉर्ड किए गए गीतों को संग्रहित किया गया है। इनमें प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगायक जीत सिंह नेगी का 1949 में जारी गीत ‘तू होली बीरा’ और मोहन उप्रेती का लोकप्रिय कुमाऊंनी गीत ‘बेड़ू पाको’ भी शामिल है। संस्थान की ओर से कहा गया कि परियोजना अध्यक्ष प्रो. बीके जोशी और निदेशक एन. रवि शंकर के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई जा रही है। डिजिटल किए गए रिकॉर्ड्स में जीत सिंह नेगी और गोपी देवी के छह-छह गीत शामिल हैं। वहीं मोहिनी शर्मा, उमा शंकर सतीश, गोपाल बाबू गोस्वामी, राज किशोर मिश्रा, वाचस्पति ड्युंडी, चंदा बाई और चंपा देवी के चार-चार गीत संग्रह का हिस्सा बने हैं। इसके साथ ही मास्टर शेर सिंह, इंदिरा बाई, राम प्यारी, केशव अनुरागी, मोहन उप्रेती, नयम खान, विजय छेत्री, सुषमा चंदोला और बिजेंद्र लाल शाह सहित अन्य कलाकारों के गीत भी डिजिटल रूप में सुरक्षित किए गए हैं।
टेप और सीडी के दौर में पीछे छूट गया ग्रामोफोन
एक समय ग्रामोफोन संगीत सुनने का प्रमुख माध्यम हुआ करता था। बाद में टेप रिकॉर्डर और फिर सीडी के दौर ने इसकी जगह ले ली। धीरे-धीरे ग्रामोफोन रिकॉर्ड घरों से गायब होते गए और पुराने रिकॉर्ड एंटीक वस्तुओं में बदलने लगे। ऐसे में पुराने गानों के रिकॉर्ड तलाशना और उनके मालिकों को उन्हें डिजिटलीकरण के लिए उपलब्ध कराने के लिए तैयार करना आसान नहीं था। पुस्तकालय से जुड़े लोगों ने अलग-अलग शहरों में मौजूद कलेक्टरों और रिकॉर्ड मालिकों से संपर्क कर इस संग्रह को तैयार किया। इस अभियान को उस समय और गति मिली जब देहरादून के कुछ निजी कलेक्टरों से दुर्लभ रिकॉर्ड पुस्तकालय तक पहुंचे। जुगल किशोर पेटसाली से मिले पांच रिकॉर्ड के बाद ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) राजेंद्र रावत के निजी संग्रह से भी पांच रिकॉर्ड प्राप्त हुए। हरियाणा के फरीदाबाद निवासी गोकुल नेगी ने अपने पिता चंद सिंह नेगी के संग्रह से सात रिकॉर्ड डिजिटलीकरण के लिए उपलब्ध कराए। वहीं नई दिल्ली के रिकॉर्ड कलेक्टर जफर शाह की ओर से चार रिकॉर्ड की डिजिटल प्रतियां दी गईं। इनमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तैयार किए गए दो गैर-वाणिज्यिक रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
‘बेड़ू पाको’ के दो अलग-अलग अंदाज सुरक्षित
इस परियोजना में ‘बेड़ू पाको’ के दो अलग-अलग संस्करण भी डिजिटल किए गए हैं। दोनों रिकॉर्ड में गीत की प्रस्तुति और संगीत का अंदाज अलग है। इनमें से एक रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश सूचना विभाग की ओर से मोहन उप्रेती और उनकी पार्टी के साथ रिकॉर्ड किया गया था। परियोजना से जुड़े लोगों के मुताबिक, दोनों संस्करणों को सुरक्षित करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके माध्यम से एक ही लोकगीत की अलग-अलग प्रस्तुतियों और उस दौर के संगीत की शैली को समझने का अवसर मिलता है।
पांच बड़ी कंपनियों के रिकॉर्ड भी मिले
अभियान के दौरान हिज मास्टर्स वॉयस, कोलंबिया, एरो-फोन, इंडियन रिकॉर्ड्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (INRECO) और स्टार हिंदुस्तान रिकॉर्ड कंपनी जैसी कंपनियों के कुल 21 ग्रामोफोन रिकॉर्ड खोजकर डिजिटल किए गए। इन 21 रिकॉर्ड्स में सात रिकॉर्ड आजादी से पहले के दौर के हैं, जबकि 14 रिकॉर्ड वर्ष 1947 के बाद के हैं। इस लिहाज से यह संग्रह उत्तराखंड के लोक संगीत के साथ-साथ उस दौर की रिकॉर्डिंग तकनीक और संगीत उद्योग के इतिहास को भी समझने में मदद करता है।
अब ग्रामोफोन संगीत के इतिहास पर होगी रिसर्च
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र अब इन रिकॉर्ड्स के आधार पर गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार क्षेत्र में ग्रामोफोन संगीत के इतिहास पर शोध रिपोर्ट तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। परियोजना से जुड़े चंद्रशेखर तिवारी के अनुसार, इन रिकॉर्ड्स को संरक्षित करने का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े संगीत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। परियोजना से जुड़े राजू गुसाईं ने बताया कि जीत सिंह नेगी के रिकॉर्ड की तलाश करीब एक दशक पहले शुरू की गई थी। देश के कई प्रमुख ग्रामोफोन कलेक्टरों से संपर्क के बावजूद रिकॉर्ड नहीं मिल सका था। बाद में फरीदाबाद से यह दुर्लभ रिकॉर्ड प्राप्त हुआ। पुराने दौर में ग्रामोफोन और उसके रिकॉर्ड आमतौर पर संपन्न परिवारों के घरों में पाए जाते थे। इन्हें रोजमर्रा के मनोरंजन के साथ-साथ मेलों, त्योहारों और शादी-ब्याह जैसे विशेष अवसरों पर भी बजाया जाता था। आज जब ग्रामोफोन रिकॉर्ड मिलना बेहद मुश्किल है, ऐसे में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र का यह डिजिटल संग्रह उत्तराखंड के पुराने लोक संगीत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
